क्या आज फिर “फूट डालो और शासन करो” की प्रवृत्ति लौट रही है? डिजिटल युग, सत्ता लालसा और समाज पर एक विश्लेषण।
क्या “फूट डालो और शासन करो” की प्रवृत्ति फिर लौट आई है? — एक सामाजिक चिंतन
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| यह शतरंज की छवि प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती है कि कैसे “फूट डालो और शासन करो” की नीति आज भी नए रूप में समाज को विभाजित करने के लिए प्रयोग की जा रही है, जहाँ लोग मोहरों की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। |
इतिहास साक्षी है कि जब भी समाज को विभाजित किया गया, उसका परिणाम दीर्घकाल में हानिकारक ही हुआ। अंग्रेज़ी शासन की रणनीति केवल प्रशासनिक नियंत्रण तक सीमित नहीं थी; वह मानसिक और सामाजिक विभाजन पर आधारित थी। इस विषय को विस्तार से समझने के लिए मेरा यह लेख अवश्य पढ़ें — How British Colonial Rule Used Indian Divide and Rule Strategy. इतिहास हमें चेतावनी देता है कि विभाजन की राजनीति समाज की जड़ों को कमजोर कर देती है।
आज अनेक युवा, जिन्हें कभी शिक्षा और नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित किया जाता था, वे पढ़ाई अधूरी छोड़कर सीधे सत्ता की ओर आकर्षित हो रहे हैं। “पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब” जैसी सीख अब “सत्ता पाओ और प्रभाव जमाओ” में परिवर्तित होती दिखाई देती है। यह परिवर्तन केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति का संकेत है।
कई बार हम देखते हैं कि अपराध और राजनीति का संबंध खुलकर सामने आता है। ऐसे व्यक्तियों को भी समाज का समर्थन मिल जाता है जो गंभीर आरोपों से घिरे होते हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। समाज का मौन समर्थन किसी भी व्यवस्था को असंतुलित कर सकता है।
डिजिटल युग ने इस प्रवृत्ति को और जटिल बना दिया है। सूचना की तीव्र गति के बीच विवेक का संतुलन कमजोर पड़ता प्रतीत होता है। आधुनिकता और उसके सामाजिक प्रभाव पर मेरे विचार इस लेख में पढ़ें — How Modernization is Changing Our Society. आधुनिकता का उद्देश्य मानव जीवन को सुगम बनाना है, न कि उसे मानसिक रूप से निर्भर बनाना।
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी आज गंभीर विषय बन चुका है। डिजिटल थकान और मानसिक बोझ पर मेरा विश्लेषण यहाँ उपलब्ध है — Why Brain Feels Tired Without Physical Work. यह समझना आवश्यक है कि तकनीकी सुविधा के साथ मानसिक संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
हम यह नहीं कह सकते कि प्रौद्योगिकी पूर्णतः हानिकारक है, किंतु अत्यधिक निर्भरता निश्चित रूप से मनुष्य की स्वाभाविक क्षमताओं को प्रभावित कर सकती है। हमें उन क्षेत्रों में कृत्रिम साधनों का उपयोग करना चाहिए जहाँ मानव क्षमता सीमित हो; परंतु जहाँ मानव स्वयं सक्षम है, वहाँ संतुलन आवश्यक है।
पर्यावरण की स्थिति भी गंभीर है। जंगलों की कटाई, प्रदूषण और संसाधनों का अत्यधिक उपयोग आने वाले समय के लिए चुनौती बन सकता है। विकास और विनाश के बीच एक सूक्ष्म रेखा होती है, जिसे पहचानना आवश्यक है।
मेरा उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि जागरूकता फैलाना है। यदि हम संतुलन नहीं साध पाए, तो भविष्य सामाजिक और मानसिक रूप से अस्थिर हो सकता है। विभाजन की राजनीति, डिजिटल अति-निर्भरता और नैतिक मूल्यों का क्षरण — ये सभी मिलकर आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित कर सकते हैं।
समाधान शिक्षा, जागरूकता और संतुलित दृष्टिकोण में निहित है। सत्ता का उद्देश्य सेवा होना चाहिए, प्रभुत्व नहीं। प्रौद्योगिकी का उद्देश्य सुविधा होना चाहिए, नियंत्रण नहीं। और नागरिकता का उद्देश्य जिम्मेदारी होना चाहिए, मौन समर्थन नहीं।
अंततः समाज वही दिशा लेता है जो उसके नागरिक तय करते हैं। यदि हम सजग रहेंगे, तो इतिहास की त्रुटियाँ दोहराई नहीं जाएँगी। यदि हम विभाजन की बजाय संवाद चुनेंगे, तो भविष्य अधिक सुरक्षित और संतुलित होगा।

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